| صلاة الله على أحمد ما تغنت | حمامة على غصنٍ تثنى | |
| سمعت سويجع الأثلاث غنى | على مطولة العذبات غنا | |
| أجابته مغردة بنجد | وثنت بالإجابة حين ثنى | |
| وبرق الأبرقين أطار نومي | وأحرمني طروقُ الطيف وهنا | |
| وذكرني الصبا النجدي عيشا | بذات البان ما أمرا واهنا | |
| ذكرت أحبتي وديار أنسي | وراجعت الزمان بهم فضنا | |
| وكاد القلب أن يسلو فلما | تذكر أبرق الحنان حنَّا | |
| ترفق بي فديتك يا رفيقي | فما عين سويهرة كوَسنا | |
| أشارك في الصبابة كل صبٍّ | إذا ما الليل جن عليه جن |